महान कोष के रचयिता प्रसिद्ध सिक्ख विद्वान भाई काहन सिंह नाभा के पिता भाई नारायण सिंह भी बहुत बड़े गुरबाणी ज्ञाता और विद्वान थे। उनको सब प्यार से बाबा जी कहते थे। वह नाभा रियासत के महाराजा हीरा सिंह के दरबारी थे। गुरबाणी बारे विचार करते हुए एक बार महाराजा ने कहा,
"सुना है कि पुरातन सिक्ख एक बैठक में श्री गुरू ग्रंथ साहिब का पूरा पाठ कर लेते थे। क्या अब कोई सिक्ख एक बैठक में पूरा पाठ कर सकता है?"
भाई नारायण सिंह ने उत्तर में कहा,
"जी हाँ ! यदि कोई श्रद्धालू पूरा पाठ एक बैठक में सुनने वाला हो।"
" मैं श्रवण करूँगा।" महाराजा ने कहा।
भाई नारायण सिंह ने बड़ी नम्रता और विश्वास के जवाब में कहा,
" ठीक है, मैं स्वयं पाठ करूँगा।"
फिर कई दिन अभ्यास करने के बाद भाई नारायण सिंह ने एक बैठक में श्री गुरू ग्रंथ साहिब का पूरा पाठ किया और महाराजा हीरा सिंह ने एक बैठक में पाठ श्रवण किया। गुरबाणी की अमृत वर्षा ने तन मन निहाल कर दिया।
महाराजा नाभा बहुत खुश हुए और उन्होंने आनंदित हो कर भाई साहब को मूँह माँगा इनाम देना चाहा। परंतु भाई नारायण सिंह जी ने गुरबाणी का कोई भी मूल्य लेने से इनकार कर दिया। इस पर महाराजा नाभा ने भाई साहब को अपनी निजी शाही पालकी में बिठा कर घर वापिस भेजा।
भाई नारायण सिंह जी ने रास्ते में देखा कि खड़े लोग उनको झुक झुक कर उनको प्रणाम कर रहे हैं।भाई साहब ने सोचा लोग समझ रहे हैं कि पालकी में महाराजा नाभा स्वयं बैठे हैं इस लिए भ्रम वश उनको प्रणाम कर रहे हैं।
घर पहुँच के जब वह पालकी से बाहर आये तो उन्होंने देखा कि पालकी उठाने वाले कहारों में एक स्वयं महाराजा नाभा हीरा सिंह थे और मार्ग में नगर वासी झुक झुक कर उन्हीं को प्रणाम कर रहे थे। यह देख कर भाई नारायण सिंह इतने भावविभोर हो गये कि उनके मुख से कोई शब्द निकलना कठिन हो गया, नेत्रों से जल बहने लगा और उनके हाथ भरसक अपने आप ही जुड़ गये।
महाराजा नाभा ने उनकी मनोदशा भाँपते हुए उनके दोनों हाथ अपने हाथों में दबा लिए और कहने लगे,
" भाई साहब यह सत्कार आपके शरीर का नहीं आपके हृदय में बसी हुई गुरबाणी का है। आपके द्वारा एक बैठक में एकरस किये श्री गुरू ग्रंथ साहिब के संपूर्ण पाठ ने जो आनंद मुझको दिया है उसके बदले मैं यदि अपना पूरा राज्य भी दे दूँ कम होगा। आपकी पालकी को कहारों के साथ कंधा देना गुरबाणी की अपार महिमा को दंडवत करने की मेरी बहुत छोटी सी कोशिश है।